ପ୍ରଥମ ଓଡ଼ିଆ ଅଡିଓ ଉପନ୍ୟାସ ‘କୁକୁର କାହାଣୀ’ ଉନ୍ମୋଚିତ
ଢେଙ୍କାନାଳ: କଥାକାର ମୃଣାଳଙ୍କ ପ୍ରଥମ ଓଡ଼ିଆ ଅଡିଓ ଉପନ୍ୟାସ ‘କୁକୁର କାହାଣୀ’ ଉନ୍ମୋଚିତ ହୋଇଛି ।.୨୦୧୯ ଡିସେମ୍ବର ମାସରେ ଟାଇମ୍ ପାସ୍ ପ୍ରକାଶନ ପକ୍ଷରୁ ଏହି ଉପନ୍ୟାସଟି...
ଢେଙ୍କାନାଳ: କଥାକାର ମୃଣାଳଙ୍କ ପ୍ରଥମ ଓଡ଼ିଆ ଅଡିଓ ଉପନ୍ୟାସ ‘କୁକୁର କାହାଣୀ’ ଉନ୍ମୋଚିତ ହୋଇଛି ।.୨୦୧୯ ଡିସେମ୍ବର ମାସରେ ଟାଇମ୍ ପାସ୍ ପ୍ରକାଶନ ପକ୍ଷରୁ ଏହି ଉପନ୍ୟାସଟି...
II ODISHABARTA II Bhubaneswar 27th Feb: The historic Asura Vihara Gumphas near Choudwar, an ancient archeological site having three rock cut caves,...
Bureau,Odishabarta Bhubaneswar:The Indian National Trust for Art and Cultural Heritage (INTACH) held its annual State Conveners Conference yesterday. Speaking at the occasion, the...
Bureau,Odishabarta OTT and technological disruptions will continue to impact cinema, say experts and scholars Dhenkanal:Technological disruptions are changing the lifestyle...
By;Anil Dhir Bhubaneswar: Early in 2016, the National Green Tribunal had directed the Environment Ministry and State governments to initiate programmes...
II ANIL DHIR II Bhubaneswar: The recent decision of the Puri Municipality to demolish the ancestral house of Gurudev Tagore located...
By; Jagpreet Luthra In One Heartless Order, Odisha Government Wipes Out Five Hundred Years of History Delhi: The climbing atop of five Nihang...
DECISION NEVER COMES FROM ARGUMENTS will not let this man Arjuna to do. He clearly knows that only the existential...
By;Vineet Tiwari Posted;Odishabarta जहां साथ की बात की गई हो, वहां विश्वास की अलग से बात करना गैर जरूरी मालूम पड़ता है l इसलिए हम इस विषय को लेते हैं सबका साथ, सबका विकास l सबका साथ सबका विकास समाज को अमृत पिलाने जैसी बात जान पड़ती है, अमृत जैसी नही तो द्यी पिलाने जैसी तो है ही l और वह भी ऐसे की हम बाहर-बाहर की बात करेंगे, कहेंगे रोजगार, कहेंगे शासन कहेंगे प्रशासन पर भीतर की, रोजगार करने वाले व्यक्ति की, शासक की, प्रशासक की और अन्य व्यक्तियों के भीतर अमृत उड़ेलने की बात नही करेंगे l अब ऐसे तो नही आ सकता सबका साथ, ऐसे तो नही हो सकता सबका विकास l व्यक्ति के विकास को व्यक्तित्व विकास को नजरअंदाज करके तो यह हो नही पाएगा l और यदि केवल व्यक्ति के भीतर विकास की कोशिश होगी, तो चाहो या नही चाहो, अमृत तो बहेगा ही lतो बात यह हुई कि मनुष्य के जागरण और आचरण में ही ऐसे अमृतमय जगत की कड़ी धूम रही है l बाल्यकाल, युवावस्था यानि कि वह समय जब व्यक्ति कम प्रपंचाशील होता है, वह समय जब उसके भीतर दुर्गंध ने अभी जगह नही बनाई होती है, तब यानि बाल्य और युवा अवस्था में व्यक्ति को जगाने का सबसे उपयुक्त समय होता है l यदि हम बाहर-बाहर से भी परखें तो पाऐंगे कि भीतर से विकसित ही विषम परिस्थितियों में संतुलन के साथ खड़ा रह सकता है, चल सकता है, निर्णय ले सकता है l ऐसा व्यक्ति ही धृणा, द्वेश, क्रूरता और भयभीत कर देने वाली परिस्थितियों में भी प्रेम, दया, वीरता और बड़े मन के साथ खड़ा रह सकता है l ऐसे विकसित के लिए जीवन कोई भार नही आनंद का डेरा है l बाहर से देखते जाएं तो हम कई प्रश्न पाऐंगे l एक तो यह कि मनुष्यों में साथ टिकने की प्रवृति धट क्यों रही है ? क्यों और कब उमंग से आगे-आगे जाता जीव एक समय बाद भयानक निराशा और भीतर के ठप्प-पन से भर जाता है ? क्यों ? क्यों से पहले तो यह समझे कि क्या बाहर-बाहर सबकुछ धनी-धनी करके, सत्ता का फैलाव बड़ाकर, कुल मिला के सबकुछ बाहर-बाहर आसान बनाकर, फैलाकर, हम क्या मनुष्यों को आपस में जोड़ पाऐंगे, क्या मनुष्य के भीतर के तोड़ को जोड़ में बदल पाऐंगे, क्या अमृतमय बना पाऐंगे ? क्या अमीर, अमीर-से-अमीरतम की चढ़ाई छोड़ देने वाला है, क्या ताकतवर बाहुबलिता तानाशाही की चढ़ाई छोड़ देने वाला है, क्या जो आसान है हम उसे आसान-तम होते हुए नही देखना चाहते l क्या शारीरिक और मानसिक श्रम की अत्याधिकता वालों मे भीतर रस बह रहा है l क्या रोजगार मिल जाने, विघालय खुल जाने, धर मिल जाने के बाद सब संतुष्ट होने वाला है l क्या इसके बाद मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से मनमुटाव नही रखेगा, क्या किसी के प्रति हिंसा नही होगी, क्या वह दूसरे के विकास में सुख लेगा l मनुष्य की कल्पना और वासना बहुत विराट होती है, अन्तहीन रूप से विराट होती है, इसलिए भीतर की यात्रा को दरकिनार करके बाहर-बाहर के उपाय समाज में अमृत नहीं पैदा कर सकते l अब सवाल यह है कि भीतर की यह यात्रा हो कैसे ? गुरु और मुखिया चाहे वह परिवार, समाज, व्यक्ति, देष किसी भी ईकाई का मार्गदर्षक हो, निर्देशक हो, वह स्वयम का जागरण करे, ऐसे करे कि किसी भी परिस्थिति में उसका धैर्य खोए नही, उसमे असीम प्रेम और करुणा हो l ऐसे जाग्रत गुरु और मुखिया ऐसे आचरण में स्वयम लग पाऐंगे जो अमृतमयी होगा l फिर निकट आए लोगो मे यह अमृत फूटेगा l असमान दृश्टि वाले, पक्षपाती, ताकत मे अंधे, अभिमानी और सदैव बाहर-बाहर ताकने वालो से तो दुनिया वैसी ही बनेगी जैसे मशीन का संगीत l याद करो उन तमाम चेहरो को, जहां से सुषासन और भ्रश्टाचार मुक्ति की बात निकलती है, और अपनेआप से यह पूछो कि क्या जहां भीतर सुशासन नही होगा, वह दण्ड के जोर से अपने से नीचे सुशासन पैदा कर सकेंगे ? जोर से सुशासन पैदा करने की कोशिश क्या उन छूट और छेदो को ढांक पाएगी जो व्यक्ति के अपने भीतर हैं, वो मौका पाते ही भ्रष्टाचार छलका देंगे l इस प्रकार से अगर सुशासन आया भी तो उसकी एक हद होगी, फिर वह हद टूट जाएगी l तो जरुरत तो ऐसे प्रेमी, निर्भीक और मुक्त गुरुओं और मुखिआओं की है, जो शिष्य और प्रजा में जरुरी साफ उर्जा का संचार और दिशा दे सके l अंत में बस इतनी हीः ‘‘तुम कहो भीतर कुछ भी, बाहर अच्छा ही रचेंगे l अब भईया जैसा वाध्य होगा, वैसा ही तो संगीत फूटेगा ा’’तो बात बस इतनी सी है कि अमृतमय समाज की अवधारणा और भीतरी कुरुपता त्यागने से परहेज, यह साथ-साथ नही चल सकते हैं l जड़ को छोड़कर पेड़ की बात करना बेमानी ही है l प्रेम के बिना मांगा गया मोक्ष भी वस्तुतः अहम ही होता है l
By;Vineet Tiwari वह तो राम से भी कह सकते हैं, कहां मिलेंगी अब सीता, पता नही कहां हैं, जीवित भी हैं या नही l वह तो राम से भी ऐसा कह ही सकते हैं और संभव है कहा भी होगा l कहा होगा अब नाहक परेशान नही हो, और यदि राम उनकी बात मान लेते, सीता को दुबारा प्राप्त कर पाऐंगे यह व्यवहारिक बात नही ऐसा सोच लेते, तब कुछ दिन शोक, सांत्वना के बाद लोग उनसे बुद्धिमान होने को कहते, कहते तुम तो राजा के बेटे हो दूसरा विवाह हो जाएगा, और वह भी एक से बढ़कर एक l पर वो राम हैं वह नही ढिगे, वह ढिग सकते भी नही l यह सब यानि जीवन का जोड़-धटा, व्यावहारिक-अव्यवहारिक, सही-गलत यह सब राम के भीतर चलता ही नही, तो वह सीता की ओर बढ़ते अपने कदम के अतिरिक्त, उनके भीतर दूसरा रास्ता दुविधा के रूप में है ही नही l वह राम हैं, प्रत्येक परिस्थिति में सौम्य हैं, क्योंकि क्षण जीवी हैं, क्षण-क्षण जीते हैं, आगे-पीछे की कहानी की सूची बनाकर नही जीते हैं, इस क्षण में क्या करना है, यह उनके भीतर स्वयम आता है l जीवन का नफा-नुकसान उनके आगे प्रकट होता ही नही क्योंकि उनके भीतर क्षण-क्षण जीने के कारण काई खिचाव या विकल्प के लिए स्थान नही बन पाता है l यह क्षण-क्षण उन्हे सौम्य, महाप्रेमी और हर क्षण के लिए समर्पित बनाता है l शेष वीरता घैर्य रास्ते के साथी भी उनके इन्ही तत्वों से निर्मित हैं l तो वह राम हैं और ऐसे ही जीवन का तो सुख है, अन्यथा तो आगे-पीछे-सोच कुछ तयकर कुछ हार जीत, खीझ बस घूमता रह, यह कोई जीवन है, चक्कर काटता रह, यह कोई जीवन है, जो कोई कह दे यह कर यह व्यवहारिक है, तू कहां अपनी धुन में है, यह सुनकर अपनी धुन का आनंद छोड़कर उसके जैसा हो जा, यह कोई जीवन है l जीवन तो राम का है, न कोई नफा है और न ही नुकसान बस आनंद है l एक कृष्ण हैं, हे प्रेमियों सीख लो इनसे की प्रेम कहते किसे हैं l इसे की सदैव प्रेम से भरे रहो, जो तुम्हे जो मानता है, उसके वही हो जाओ, तुम्हारे लिए तो वह प्रेमी है, किसी भी रिश्ते में, नाते में l हे प्रेमियों सीख लो कृष्ण से कि प्रेम से लबालब रहने में कितना आनंद, कितना मोह-हीनता, कितनी वीरता, कितना धैर्य प्रकट होता है l अब कोई यदि राम और कृष्ण से सीखकर अपनी आदते बदल रहा है, तो वह यह भी समझ ले, बस कपड़े बदल रहा है, भीतर कुछ नही हो रहा, बस यह नैतिकता की चीख जैसा है l बिना धर्म को महसूस किए-करे, यह नैतिकता की सूखी नंगी चीख के अतिरिक्त कुछ नही साबित होगा, बेहद अवैज्ञानिक होगा यह l तो फिर क्या करें, कैसे हो जाएं राम, कैसे जिए कृष्ण को ? वही, प्रेम से, ध्यान से, अपने उर्जा स्थानो को जगाओ, भूख प्यास, काम मोह, वीरता, प्रेम, स्पश्टता, दिव्यता, प्रभुता की साधना करो, उर्जाओं को निर्बाध बहने का अवसर दो, तब कहीं जाकर वह क्षण आएगा जब भीतर राम आऐंगे कृष्ण आऐंगे.