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सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास Featured

By;Vineet Tiwari

Posted;Odishabarta

जहां साथ की बात की गई हो, वहां विश्वास की अलग से बात करना गैर जरूरी मालूम पड़ता है l इसलिए हम इस विषय को लेते हैं सबका साथ, सबका विकास l

सबका साथ सबका विकास समाज को अमृत पिलाने जैसी बात जान पड़ती है, अमृत जैसी नही तो द्यी पिलाने जैसी तो है ही l और वह भी ऐसे की हम बाहर-बाहर की बात करेंगे, कहेंगे रोजगार, कहेंगे शासन कहेंगे प्रशासन पर भीतर की, रोजगार करने वाले व्यक्ति की, शासक की, प्रशासक की और अन्य व्यक्तियों के भीतर अमृत उड़ेलने की बात नही करेंगे l

अब ऐसे तो नही सकता सबका साथ, ऐसे तो नही हो सकता सबका विकास l व्यक्ति के विकास को व्यक्तित्व विकास को नजरअंदाज करके तो यह हो नही पाएगा l

और यदि केवल व्यक्ति के भीतर विकास की कोशिश होगी, तो चाहो या नही चाहो, अमृत तो बहेगा ही lतो बात यह हुई कि मनुष्य के जागरण और आचरण में ही ऐसे अमृतमय जगत की कड़ी धूम रही है l बाल्यकाल, युवावस्था यानि कि वह समय जब व्यक्ति कम प्रपंचाशील होता है, वह समय जब उसके भीतर दुर्गंध ने अभी जगह नही बनाई होती है, तब यानि बाल्य और युवा अवस्था में व्यक्ति को जगाने का सबसे उपयुक्त समय होता है l यदि हम बाहर-बाहर से भी परखें तो पाऐंगे कि भीतर से विकसित ही विषम परिस्थितियों में संतुलन के साथ खड़ा रह सकता है, चल सकता है, निर्णय ले सकता है l ऐसा व्यक्ति ही धृणा, द्वेश, क्रूरता और भयभीत कर देने वाली परिस्थितियों में भी प्रेम, दया, वीरता और बड़े मन के साथ खड़ा रह सकता है l ऐसे विकसित के लिए जीवन कोई भार नही आनंद का डेरा है l

बाहर से देखते जाएं तो हम कई प्रश्न पाऐंगे l एक तो यह कि मनुष्यों में साथ टिकने की प्रवृति धट क्यों रही है ? क्यों और कब उमंग से आगे-आगे जाता जीव एक समय बाद भयानक निराशा और भीतर के ठप्प-पन से भर जाता है ? क्यों ?

क्यों से पहले तो यह समझे कि क्या बाहर-बाहर सबकुछ धनी-धनी करके, सत्ता का फैलाव बड़ाकर, कुल मिला के सबकुछ बाहर-बाहर आसान बनाकर, फैलाकर, हम क्या मनुष्यों  को आपस में जोड़ पाऐंगे, क्या मनुष्य के भीतर के तोड़ को जोड़ में बदल पाऐंगे, क्या अमृतमय बना पाऐंगे ?

क्या अमीर, अमीर-से-अमीरतम की चढ़ाई छोड़ देने वाला है, क्या ताकतवर बाहुबलिता तानाशाही की चढ़ाई छोड़ देने वाला है, क्या जो आसान है हम उसे आसान-तम होते हुए नही देखना चाहते l क्या शारीरिक और मानसिक श्रम की अत्याधिकता वालों मे भीतर रस बह रहा है l

क्या रोजगार मिल जाने, विघालय खुल जाने, धर मिल जाने के बाद सब संतुष्ट होने वाला है l क्या इसके बाद मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से मनमुटाव नही रखेगा, क्या किसी के प्रति हिंसा नही होगी, क्या वह दूसरे के विकास में सुख लेगा l

मनुष्य की कल्पना और वासना बहुत विराट होती है, अन्तहीन रूप से विराट होती है, इसलिए भीतर की यात्रा को दरकिनार करके बाहर-बाहर के उपाय समाज में अमृत नहीं पैदा कर सकते l
अब सवाल यह है कि भीतर की यह यात्रा हो कैसे ?

गुरु और मुखिया चाहे वह परिवार, समाज, व्यक्ति, देष किसी भी ईकाई का मार्गदर्षक हो, निर्देशक हो, वह स्वयम का जागरण करे, ऐसे करे कि किसी भी परिस्थिति में उसका धैर्य खोए नही, उसमे असीम प्रेम और करुणा हो l ऐसे जाग्रत गुरु और मुखिया ऐसे आचरण में स्वयम लग पाऐंगे जो अमृतमयी होगा l फिर निकट आए लोगो मे यह अमृत फूटेगा l

असमान दृश्टि वाले, पक्षपाती, ताकत मे अंधे, अभिमानी और सदैव बाहर-बाहर ताकने वालो से तो दुनिया वैसी ही बनेगी जैसे मशीन का संगीत l

याद करो उन तमाम चेहरो को, जहां से सुषासन और भ्रश्टाचार मुक्ति की बात निकलती है, और अपनेआप से यह पूछो कि क्या जहां भीतर सुशासन नही होगा, वह दण्ड के जोर से अपने से नीचे सुशासन पैदा कर सकेंगे ? जोर से सुशासन पैदा करने की कोशिश क्या उन छूट और छेदो को ढांक पाएगी जो व्यक्ति के अपने भीतर हैं, वो मौका पाते ही भ्रष्टाचार छलका देंगे l इस प्रकार से अगर सुशासन आया भी तो उसकी एक हद होगी, फिर वह हद टूट जाएगी l

तो जरुरत तो ऐसे प्रेमी, निर्भीक और मुक्त गुरुओं और मुखिआओं की है, जो शिष्य और प्रजा में जरुरी साफ उर्जा का संचार और दिशा दे सके l

अंत में बस इतनी हीः

‘‘तुम कहो भीतर कुछ भी, बाहर अच्छा ही रचेंगे l

अब भईया जैसा वाध्य होगा, वैसा ही तो संगीत फूटेगा ’’तो बात बस इतनी सी है कि अमृतमय समाज की अवधारणा और भीतरी कुरुपता त्यागने से परहेज, यह साथ-साथ नही चल सकते हैं l जड़ को छोड़कर पेड़ की बात करना बेमानी ही है l प्रेम के बिना मांगा गया मोक्ष भी वस्तुतः अहम ही होता है l

 

Read 293 times Last modified on Tuesday, 05 November 2019 04:54
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