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घ्यान क्यों करें (?)

घ्यान क्यों करें (?) Featured

हम सब यह जानते हैं कि क्या करने से और क्या नही करने से, कहां टिकने से कहां से चल देने से, हमे सुख-शांति मिलती है परन्तु उस ओर जाने में हमें थोड़ी समस्या है, क्योंकि हमारा दिमाग हमेशा  हमसे प्रश्न करता है, यह करके क्या मिलेगा, ऐसा करने से क्या होगा ठीक है यहां टिक कर अच्छा लग रहा है, पर अब और देर रुककर क्या होगा, वगैरह वगैरह


घ्यान भी टिक कर करने से एक समय के बादकुछ नही कीस्थिति आती है, इस स्थिति में कुछ भी नही होता, यह एक खालीपन है, अब चूंकि यह एक निर्बाध की स्थिति है इसलिए यहां आनंद मिलता है परन्तु या तो हम ध्यान में टिकते नही, या ध्यान में टिकने पर, ऐसी स्थिति आने पर दिमाग प्रश्न करता है, ठीक है आनंद मिल रहा है पर इससे क्या होगा ? इससे मुझे क्या प्राप्त हो जाएगा ?


एक महात्मा थे, उनसे किसी ने प्रश्न किया कि ध्यान क्या है ? महात्मा कुछ देर तक चुप रहे, कुछ नही बोले, पूछने वाले ने कहा आप कहां खो गये महात्मा महात्मा बोले तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूं पूछने वाले ने कहा आप तो कुछ बोले ही नही महात्मा ने कहा घ्यानकुछ नहीहै, इसलिये मैं कुछ नही बोला


अब घ्यान कुछ नही है तो क्या है और ऐसे कुछ नही से मिलेगा क्या ?


व्यक्ति जितनी बार भी कुछ नही की स्थिति में पहुंचता है, भीतर के मार्ग उर्जाओं के निर्बाध प्रवाह के लिए खुलने लगते हैं, और जैसा कि पहले कहा आनंद भी इसीलिए होता है अब प्रश्न यह है कि हमे इस आनंद से मिलेगा क्या, यदि कुछ देर टिककर यह आनंद पा भी लिया तो उससे हमारे जीवन में क्या बदल जाएगा


उत्तर उर्जांओ के निर्बाध प्रवाह में है, यह कुछ नही की स्थिति व्यक्ति की उर्जाओं को बाधारहित प्रवाह देकर नया बनाती है पूर्व में एकत्रित हुई नकारात्मकता कम होने लगती है कमजोर हो चुकी सकारात्मकता को पंख लग जाते हैं हम स्वयम की उर्जा को महसूस कर पा रहे होते हैं, हमारे भीतर और बाहर क्या चल रहा है यह हम पर प्रकट होने लगता है एक बालक के चेहरे पर जितना चटकपन होता है, उसकी आंखो मे जितना खिचाव होता है, ध्यानी की स्थिति भी वैसी ही बनने लगती है हर बार घ्यान केवल दुबारा जन्म देता है बल्कि उर्जाओं का विस्तार वहां तक करता है, जहां इससे पहले कभी छू भी नही पाए थे अब सपने गढ़ने होते हैं, दिमाग लगाकर पिरोने होते हैं, अब तो आकाश  बड़ा हो चुका है और वह हर रोज नया और आगे बड़ा हुआ आपके सामने स्वयम प्रकट करता है परन्तु कितने समर्पण के बाद, कितने लगाव से ध्यान करने के बाद, कुछ नही की स्थिति आएगी, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को अबतक कैसे जीते आऐं हैं , स्वयम को हम किस हद तक बांधकर और खोलकर जीते हैं

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